Wanderers Perspective

✨Little Bit of Everything ✨
Article 15 – “Yes, ‘n’ how many years can some people exist before they’re allowed to be free?”

Article 15 – “Yes, ‘n’ how many years can some people exist before they’re allowed to be free?”

“कहब तो लग जाई धक् से-

हमरे गरीबन के झोपड़ी जुलम्बा-

बर्सेला पानी तो छत से गिरे टप्प से-

कहब तो लग जाई धक् से 

My story

सितम्बर’18, मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में बस दो महीने ही शेष थे. The Scheduled Castes and Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के कुछ प्रावधानों के खिलाफ माननीय उच्चतम न्यायलय ने फैसला सुनाया था जिसको लेकर SC-ST समुदाय में बहुत रोष था. इस नाराजगी को दूर करने के लिए केंद्र-सरकार ने एक amendment बिल लाया. इस बदलाव के विरोध में मध्यप्रदेश के सवर्णों ने एक संगठन बनाया – सपाक्स. जो कि बाद में जाकर एक राजनीतिक पार्टी भी बनी. सारे सवर्णों ने जब एक दिन मध्प्रदेश बंद का आह्वान किया, तब मैं मध्यप्रदेश के सागर जिले में आने वाले अपने छोटे से गाँव में अपने दोस्तों से इसी विषय पर बात कर रहा था. तर्क-वितर्क के बीच मेरे एक दोस्त, जो की दलित समुदाय से आता है, एक ऐसी बात कही जो अब तक मेरे दिमाग से जा नहीं पायी है.

उसने अपने बुन्देलखंडी लहजे में कहा,

” जौन दिन वामन अपने मंदिर में हमें पंडितयायी करन दें और वे हमाये घर की टट्टी साफ़ करें, ओ दिना से हम आरक्षण माँगवो छोड़ देहें”

Article-15 , the movie…

अनुभव सिन्हा की आर्टिकल 15 भारत की जातिगत व्यवस्था और दलितों पर हो रहे अत्याचार की कहानी है. यह एक ऐसा विषय है जिस पर भारतीय फिल्मकार हमेशा फिल्म बनाने से बचे है. रविश कुमार के शब्दों में कहें तो अनुभव सिन्हा ने बिरनी के छत्ते में हाथ डाला है.आज जहाँ देशभक्ति पर बन रही फिल्मों की भरमार है ऐसे समय में अनुभव सिन्हा ने , सही मायने में जिसे देशभक्ति कहा चाहिए, पर फिल्म बनायी है

जाति भारत के लोगों के डीएनए में इतने अंदर तक जा चुकी है की आधुनिक शिक्षा भी जाति के इस चक्रव्यूह को तोड़ नहीं पायी है. कई लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि, ‘जाति जो कभी नहीं जाती.

लेकिन अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी ने जाति के इस व्यूह को तोड़ने की जो छोटी से कोशिश की है, इस साहस के लिए वो बधाई के पात्र है.

Article -15 (Image Courtesy – Google)

फिल्म रिलीज होने के बाद, मंगलवार के दिन भी दिल्ली जैसे शहर में सिनेमा-हॉल का हाउसफुल होना साफ़ दर्शाता है कि फिल्म कितनी अच्छी बनायी गयी गई है. एक ही दिन बेक-टू-बेक दो शो देखना

और अपने अंदर के इंसान से लगातार प्रश्न करना, इस फिल्म को सिनेमा के मापदंडो पर एक सफल फिल्म बनाता है. बहुत दिनों बाद फिल्म देखकर लगा डायरेक्टर फिल्म के माध्यम से कुछ कहना चाहता है.

‘कहब तो लग जाए धक् से’ शुरू होती फिल्म की आखिरी तक आते -आते आपको vacuum में ले जाकर छोड़ देती है. यह वैक्यूम मुझे बार-बार अपने बचपन में वापिस ले जाता रहा.जहाँ पता हीं नहीं चला था कि कब मैं यह सीख गया कि इस इंसान से छिलना नहीं है. इसको पानी घर के स्टील के गिलास में नहीं काँच के गिलास में देना है. अपने SC वर्ग से आने वाले बेस्ट फ्रेंड के लिए घर में आने देने के लिए लड़ना . सारे दोस्तों का मुझसे कुछ दिनों के लिए बात करना छोड़ देना सिर्फ इसीलिए मैंने यह कह

दिया था कि मै अपने ही क्लास में पढने वाले एक लड़के को भंगी कहकर नहीं बुलाऊंगा.

वह सारे दृश्य आँखों के सामने चलते रहे कि कैसे दलित समुदाय के लोगों को आज से कुछ साल पहले तक गाँव के ब्राह्मण के घर के सामने से अपने चप्पल हाथों में लेकर निकलना होता था.

आर्टिकल 15 ने मुझे आश्चर्य में नहीं डाला बल्कि एक ग्लानि से भर दिया कि कैसे अपर क्लास लोग इग्नोरेंट हो गए है. उन्हें न कोई पछतावा है, न कोई दुःख और न ही खुद को सुधारने का कोई जुनून. वह मानते कि यह सब गलत है लेकिन फिर भी अपने ‘So-called-Privileged’को छोड़ना नहीं चाहते.

The Musing…

Yes, ‘n’ how many years can some people exist

Before they’re allowed to be free?

– Bob Dylan

बॉब डिलन के ‘blowing in the wind’ से कहानी की मुख्य किरदार अयान की एंट्री होती है.

फिल्म का रिव्यु उन लोगों को लिखना चाहिए जो इस विधा में माहिर है. दर्शको को सिर्फ यह बताना चाहिए उनको फिल्म देखकर कैसा लगा.

भोर में फिल्माए गए सीन एक सिहरन पैदा करते है. Ewan Mulligan ने अपनी cinematography से फिल्म में सजीवता ला दी है. फिल्माकन से संवाद का यह तरीका कहानी को और मजबूत बनाता है.

रस्सी से लटकाई गयी लड़कियों वाला दृश्य अंदर से हिला देता है. आपको ऐसा लगता है आप कुर्सी से उठें और कुछ करें. आपको आपका कुछ न कर पाना कचोटता है. फिल्म धीरे- धीरे आगे बढती है और दलितों की स्थिति की वह सच्चाई जिसे आप जानकार भी अनजान हैं ,को आपके सामने परतों के जैसे खोल देती है.

“हीरो नहीं चाहिए अयान बस ऐसे लोग चाहिए जो हीरो का वेट न करें”

Article -15 (Image Courtesy- Google)

बैकग्राउंड म्यूजिक दर्शक को फिल्म से अलग नहीं होने देता. BGM कहानी को भी बांधे रखता है और दर्शकों को भी.

फिल्म के सारे किरदार महत्पूर्ण है बहुत दिनों बाद ऐसी फिल्म जिसके हर एक किरदार की फिल्म की विशेष भूमिका है. कोई एक किरदार भी यदि नहीं होता तो फिल्म अधूरी रह जाती.

Article-15 (Image courtesy- Google)

जाटव जिसने अपनी मेहनत से महकमे में अपनी जगह बनायीं है. लेकिन उसके अंदर सहानुभूति है अपने समुदाय से आने वाले ओगो के लिए लेकिन अपने आपको ऊपर मानने का एक भाव भी है.

जैसा जाटव के एक संवाद से पता चलता है, “मैं चमाड़ हूँ, ये पासी है.”. इस संवाद से फिल्म एक और खास समस्या की बतलाती है कि, ब्रहाम्न्वाद सिर्फ ब्राह्मण तक सीमित नहीं है. यह पिछड़ा वर्ग में भी है और दलितों में भी.

ब्रह्मदत्त जिसे फिल्म में राजपूत(सिंह) दिखाया गया है. जो लड़की के बलात्कार में शामिल होता है और जिसके चेहरे पर से आरोप सिद्ध हो जाने पर भी अपनी जाति के दंभ क ेभाव नहीं जाते. जेल में जाने से पहले वो जाटव से कहता है , “आखिर तुमने अपने जात दिखा ही दी”. जिस पर जाटव ब्रह्मदत्त को थप्पड़ मारते हुए कहता है कि, “कब तक लगवायेंगे हमसे झाड़ू”. यह दृश्य बदलाव की की उम्मीद जगाता है.

निहाल, मयंक के किरदार भी इतने गहराई और उत्तरप्रदेश की जातिगत व्यवस्था को समझते हुए लिखे गए है कि आपको कुछ भी बनावटी नहीं लगता.

अयान फिल्म का हीरो जो कि ब्राह्मण है, ब्राह्मण जो कि भारतीय वर्णव्यवस्था में सबसे ऊपर होते है. अयान जो भारत की परिस्थितियों से अनजान है, जिसे दलितों पर अन्याय के बारे में कुछ भी नहीं मालूम होता. अयान जिसे उसकी गर्लफ्रेंड लार्ड माउंटबेटन कहकर बुलाती है. अयान का इन समस्याओं से अनजान बताना और उसके character को unbiased दिखाना कहानी के लिहाज से बहुत जरुरी था.

निषाद जो कहानी का हीरो न होकर भी हीरो था.निषाद जो कहता है इन्साफ की भीख मत मांगो बहुत मांग चुके .निषाद जिसे ब्रह्मदत्त दलितों का रॉबिनहुड कहकर बुलाता है. निषाद जो लड़ाई लड़ रहा है सारे अत्याचारों के विरूद्ध. जिसने संविधान के बारे में मालूम है. जिसने बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर को पढ़ा है. निषाद जो भगत सिंह से प्रेरित है. निषाद जिसे पाश की कविता पसंद है. निषाद जिसे गौरा से प्रेम है. जो गौरा के साथ चाँद देखना चाहता है, नदी में पैर डाल उस बात करना चाहता है, निषाद जिससे सबको उम्मीदें है और निषाद जिसे मार दिया जाता है और मरने से पहले कहता है, “हम आखिरी थोड़े न है”.

“मैं और तुम इन्हें दिखाई ही नहीं देते, हम कभी हरिजन हो जाते है, कभी बहुजन हो जाते है. बस जन नहीं बन पा रहे हैं की जन-गण-मन में हमारी भी गिनती हो “

कुमुद मिश्रा(जाटव) , मनोज पाहवा( ब्रह्मदत्त ), ईशा तलवार(अदिति) ,सयानी  गुप्ता (गौरा), मुम्म्मद जीशन अयूब (निषाद), आयुष्मान खुराना ( अयान) सभी ने अपने अभिनय से मूवी में जान डाल दी है.

निषाद का किरदार तो साथ रह जाता है हॉल छोड़ने के बाद भी. जीशान अयूब ने अपनी आवाज औऱ अपने अभिनव से निषाद के किरदार को अमर कर दिया है.

” Editing is like dancing. You have to find your own flow. Your rhythm. It’s not just about making images. Editing is much more about what lies in the cuts. For its in those spaces, you the viewer can make the movement/storytelling your own. A great editor will make you flow with the rhythm, the flow of the story. In a way you can never even imagine in the script .”

फिल्म के एक पक्ष जिस पर कम बात हो रही है, वह है इसकी editing. इतनी बारीकी सेediting की गयी है कि एक भी सीन फालतू नहीं लगता. फिल्म शुरू से लेकर आखरी तक आपको बांधे रखती है. Yasha Ramchandani ने अपनी editing से जादू कर दिया है, editing की ही वजह से दर्शक कहानी के साथ-साथ चलते है. Yasha Ramchandani कोइतनी शानदार editing के लिए बधाई.

अब बात फिल्म की स्टोरी, स्क्रीनप्ले और निर्देशन की. गौरव सोलंकी ने अपनी राइटिंग से, अपनी समझ से, अपनी रिसर्च से , अपने पोएटिक व्यक्तित्व से कहानी में एक कविताई प्रभाव लाया है.

गौरव सोलंकी जो अगली में लिखते है ,

” Aag ki bhi chaanw hai kya
Cheentiyon ke gaon hai kya
Jis kuye mein hum gire hai
Us kuye mein naav hai kya “

Ugly से लेकर article 15 का सफ़र एक उम्मीद का सफ़र रहा है सिर्फ गौरव सोलंकी के लिए नहीं बल्कि article 15 के बाद गौरव सोलंकी को मिल रही तारीफ़ के बाद बॉलीवुड के लिए भी. एक साहित्यकार जब एक फिल्म लिखता है तो वो संयोग बहुत दिलचस्प और लाजवाब होता है. गौरव सोलंकी ने जिस गहराई के साथ फिल्म के संवाद लिखें है, वह उनके गुस्से और साहस दोनों को दिखाते है, मसलन गौरा और निषाद के बीच के संवाद और निषाद के सारे संवाद फिल्म के लिए ऑक्सीजन का काम करते है. बहुत दिनों बाद फिल्म के राइटर का हर रिव्यु में नाम लिखा जा रहा है, डायरेक्टर के साथ बराबरी से बात की जा रही है. बॉलीवुड के लिए गौरव सोलंकी की सफलता एक नया युग लेकर आएगी यह निश्चित है.

Article-15 (इमेज – The Indian Express)

अनुभव सिन्हा के कमाल निर्देशन किया ही, चाहे वह फिल्माकन हो या स्क्रीनप्ले या सारे किरदारों से अभिनय कराना हो लेकिन इन सबसे इतर अनुभव सिन्हा बधाई के पात्र है इस विषय पर फिल्म बनाने के लिए . मुल्क के बाद article 15 बनाकर अनुभव सिन्हा अपने समकालीन दोस्तों से बहुत आगे निकल गए है. जब राजनीति पर सब बात करने से डर रहे है, इस समय में article 15 बनाना और एक नई बहस हो छेड़ना अपने आप में एक साहस का काम है.

फिल्म में क्या गलतियाँ थी इसको बताने के काबिल, मै अपने आपको नहीं समझता. एक फिल्म बनाने से भारत की जातिगत व्यवस्था ध्वस्त हो जाए, दलितों पर से अत्याचार बंद हो जाएँ यह नामुमकिन है लेकिन बात को छेड़ना भी और इसे आगे बढ़ाना बहुत जरुरी है क्युंकि बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी .

और दुष्यंत कुमार लिखते हैं कि,

“कैसे आकाश में सुराख़ हो नहीं सकत

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो  “

आज नहीं लेकिन एक दिन ऐसा जरुर आएगा जब भारतीय संविधान का article 15 सही मायने में लागू हो आयेगा और बाबा साहब के सपनो का भारत, जिसमे सब सामान होंगें, बन पायेगा.

जय भीम.

जय हिन्द.

“फर्क बहुत कर लिया, अब फर्क लायेंगे.”

Article-15 (Image Courtesy – Amul)
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